ثُمَّ عَفَوْنَا عَنكُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
क़ुरआन शब्दावली · प्रारूप
شكر
कद्र करना
किसी लाभ या अच्छे कार्य को पहचानकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देना।
स्रोतों का इतिहास
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शब्दार्थिक दायरा
दायरा: अर्थगत इकाई · प्रयोग: 75
शब्द-मूल: شكر
लेम्मा: شكر · شاكر · شكور · مشكور
रूप: تَشْكُرُ · يَشْكُرُ · شَّٰكِرِينَ · ٱشْكُرُ · شَكُورٍ · شَكُورٌ · شَاكِرًا · شَكَرْ · مَّشْكُورًا · شُكُورًا · أَشْكُرَ · شَكَرَ · ٱشْكُرْ · شَاكِرٌ · شَٰكِرِينَ · شَكُورًا · شَٰكِرُونَ · أَشْكُرُ · يَشْكُرْ · شُكْرًا · شَّكُورُ
प्रयोग के उदाहरणों की प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 75
क़ुरआन-क्रम में दायरा-बद्ध प्रयोगों का स्थान-आधारित संक्षिप्त पूर्वावलोकन—क्रम के आरंभ से प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 75। छोड़े गए प्रयोगों की संख्या 65 है; प्रदर्शित प्रयोगों को उनसे अधिक प्रबल साक्ष्य नहीं माना गया है।
ثُمَّ بَعَثْنَٰكُم مِّنۢ بَعْدِ مَوْتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
فَٱذْكُرُونِىٓ أَذْكُرْكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِى وَلَا تَكْفُرُونِ
إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلْمَرْوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ فَمَنْ حَجَّ ٱلْبَيْتَ أَوِ ٱعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَإِنَّ ٱللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَٰتِ مَا رَزَقْنَٰكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِلَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
شَهْرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْءَانُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٍ مِّنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا۟ ٱلْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا۟ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ خَرَجُوا۟ مِن دِيَٰرِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ ٱلْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ ٱللَّهُ مُوتُوا۟ ثُمَّ أَحْيَٰهُمْ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ بِبَدْرٍ وَأَنتُمْ أَذِلَّةٌ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ ٱلرُّسُلُ أَفَإِي۟ن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ ٱنقَلَبْتُمْ عَلَىٰٓ أَعْقَٰبِكُمْ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ ٱللَّهَ شَيْـًٔا وَسَيَجْزِى ٱللَّهُ ٱلشَّٰكِرِينَ
وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تَمُوتَ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ كِتَٰبًا مُّؤَجَّلًا وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ ٱلدُّنْيَا نُؤْتِهِۦ مِنْهَا وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ ٱلْـَٔاخِرَةِ نُؤْتِهِۦ مِنْهَا وَسَنَجْزِى ٱلشَّٰكِرِينَ
क़ुरआन-अंतर्गत शब्दार्थिक आधार
यह शब्दावली क्यों
किसी लाभ या अच्छे कार्य को पहचानकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देना।
कद्र करना अच्छाई की पहचान को सकारात्मक प्रतिक्रिया से जोड़ता है। 4:147 में लोग कृतज्ञ हैं और ईश्वर कद्र करने वाला है; ये एक ही मूल अर्थ की अलग व्याकरणिक और संदर्भगत अभिव्यक्तियाँ हैं। कद्र करने का अर्थ यह नहीं कि ईश्वर को किसी लाभ की आवश्यकता है (27:40; 31:12)। 17:19 और 76:22 में प्रयास की कद्र की जाती है: कर्मवाच्य रूप उस चीज़ का वर्णन करता है जिसकी कद्र होती है, किसी कृतज्ञ कर्ता का नहीं।
दूसरे अर्थ कहाँ असफल होते हैं: ‘कृतज्ञ’ हर रूप की जगह नहीं ले सकता, क्योंकि ‘कृतज्ञ प्रयास’ 17:19 और 76:22 के कर्मवाच्य संबंध को उलट देता है। पूरे अर्थ के रूप में ‘पुरस्कार देना’ बहुत संकीर्ण है: 76:9 प्रतिफल और कृतज्ञता को अलग-अलग नाम देता है, जबकि 31:14 बिना चुकौती निर्दिष्ट किए ईश्वर और माता-पिता के प्रति कृतज्ञता माँगता है। ‘केवल धन्यवाद कहना’ भी बहुत सीमित है, क्योंकि 34:13 कृतज्ञता को काम से जोड़ता है। मौजूदा ‘अच्छाई को स्वीकार करना’, अनुकूल प्रतिक्रिया वाली परिभाषा के साथ, अब भी एक व्यवहार्य निकट समतुल्य है, खंडित अर्थ नहीं।
अलग रूप شَاكِر और شَكُور अपने अलग व्याकरणिक नियम बनाए रखते हैं। شَكُور के लिए ‘कृतज्ञ’ और ‘कद्र करने वाला’ सावधान, परिचित शब्दावली बनाए रखते हैं; ‘गहराई से’ जैसा मात्रा-सूचक क्रियाविशेषण अनिवार्य नहीं है। तीव्रता या प्रवृत्ति दर्शाने वाले रूप को सबसे अच्छी तरह कैसे व्यक्त किया जाए, यह शोध का खुला प्रश्न है। कर्मवाच्य ‘जिसकी कद्र की गई’ और संज्ञा ‘कृतज्ञता’ सक्रिय वर्णनों से अलग रहते हैं।