وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوْا۟ إِلَىٰ شَيَٰطِينِهِمْ قَالُوٓا۟ إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِءُونَ
क़ुरआन शब्दावली · स्वीकृत
ل ق ي
मुठभेड़
एक स्थानिक-संबंधपरक क्रिया जिसमें कोई सत्ता किसी व्यक्ति, वस्तु, अवस्था, स्थान, सतह, घटना या दिशा के साथ सामना-संबंध में आती है। रूपविज्ञान तय करता है कि कोई प्रयोग प्रत्यक्ष सामना, कारणन, ग्रहण, पारस्परिकता, सहभागी या दिशा को नाम देता है।
शब्दार्थिक दायरा
दायरा: शब्द-मूल · प्रयोग: 146
शब्द-मूल: لقي
लेम्मा: ألقى · لقاء · لق · التقى · لقى · تلقى · ملاقوا · تلقاء · ملقي · يلاق · ملاقي · لاقي
रूप: لِقَآءَ · أَلْقَىٰ · أَلْقَ · لِقَآءِ · أَلْقُ · أَلْقِ · أُلْقِىَ · أَلْقَيْ · ٱلْتَقَى · أَلْقَى · لَقِي · يَلْقَ · لِقَآئِ · لَقُ · مُّلَٰقُوا۟ · يُلْقُ · يُلْقِى · يُلَقَّىٰ · يُلَٰقُ · تُلْقُ · نُلْقِى · تِلْقَآءَ · تُلْقِىَ · مُّلْقُونَ · يُلْقَىٰٓ · أُلْقُ · أَلْقِيَ · مُلَٰقِي · تَلَقَّىٰٓ · مُّلَٰقُو · ٱلْتَقَ · تَلْقَ · أَلْقَىٰٓ · مُلْقِينَ · أُلْقِى · ٱلْتَقَيْ · تِلْقَآئِ · يَلْقَىٰ · تُلْقَىٰ · لَقِيَ · يُلْقِ · تَتَلَقَّىٰ · تَلَقَّ · يُلَقَّ · تُلَقَّى · لَٰقِي · لِّقَآئِ · تَّلَاقِ · يُلْقَىٰ · لِّقَآءِ · يَتَلَقَّى · مُتَلَقِّيَانِ · ءُلْقِىَ · يَلْتَقِيَ · مُلَٰقٍ · لَقَّىٰ · مُلْقِيَٰتِ · أَلْقَتْ
प्रयोग के उदाहरणों की प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 146
क़ुरआन-क्रम में दायरा-बद्ध प्रयोगों का स्थान-आधारित संक्षिप्त पूर्वावलोकन—क्रम के आरंभ से प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 146। छोड़े गए प्रयोगों की संख्या 136 है; प्रदर्शित प्रयोगों को उनसे अधिक प्रबल साक्ष्य नहीं माना गया है।
فَتَلَقَّىٰٓ ءَادَمُ مِن رَّبِّهِۦ كَلِمَٰتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَأَنَّهُمْ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ
وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ قَالُوٓا۟ أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَآجُّوكُم بِهِۦ عِندَ رَبِّكُمْ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
وَأَنفِقُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا تُلْقُوا۟ بِأَيْدِيكُمْ إِلَى ٱلتَّهْلُكَةِ وَأَحْسِنُوٓا۟ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ
نِسَآؤُكُمْ حَرْثٌ لَّكُمْ فَأْتُوا۟ حَرْثَكُمْ أَنَّىٰ شِئْتُمْ وَقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُمْ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُم مُّلَٰقُوهُ وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِٱلْجُنُودِ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ مُبْتَلِيكُم بِنَهَرٍ فَمَن شَرِبَ مِنْهُ فَلَيْسَ مِنِّى وَمَن لَّمْ يَطْعَمْهُ فَإِنَّهُۥ مِنِّىٓ إِلَّا مَنِ ٱغْتَرَفَ غُرْفَةًۢ بِيَدِهِۦ فَشَرِبُوا۟ مِنْهُ إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ فَلَمَّا جَاوَزَهُۥ هُوَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ قَالُوا۟ لَا طَاقَةَ لَنَا ٱلْيَوْمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ قَالَ ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَٰقُوا۟ ٱللَّهِ كَم مِّن فِئَةٍ قَلِيلَةٍ غَلَبَتْ فِئَةً كَثِيرَةًۢ بِإِذْنِ ٱللَّهِ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ
قَدْ كَانَ لَكُمْ ءَايَةٌ فِى فِئَتَيْنِ ٱلْتَقَتَا فِئَةٌ تُقَٰتِلُ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَأُخْرَىٰ كَافِرَةٌ يَرَوْنَهُم مِّثْلَيْهِمْ رَأْىَ ٱلْعَيْنِ وَٱللَّهُ يُؤَيِّدُ بِنَصْرِهِۦ مَن يَشَآءُ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةً لِّأُو۟لِى ٱلْأَبْصَٰرِ
ذَٰلِكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْغَيْبِ نُوحِيهِ إِلَيْكَ وَمَا كُنتَ لَدَيْهِمْ إِذْ يُلْقُونَ أَقْلَٰمَهُمْ أَيُّهُمْ يَكْفُلُ مَرْيَمَ وَمَا كُنتَ لَدَيْهِمْ إِذْ يَخْتَصِمُونَ
هَٰٓأَنتُمْ أُو۟لَآءِ تُحِبُّونَهُمْ وَلَا يُحِبُّونَكُمْ وَتُؤْمِنُونَ بِٱلْكِتَٰبِ كُلِّهِۦ وَإِذَا لَقُوكُمْ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوْا۟ عَضُّوا۟ عَلَيْكُمُ ٱلْأَنَامِلَ مِنَ ٱلْغَيْظِ قُلْ مُوتُوا۟ بِغَيْظِكُمْ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
क़ुरआन-अंतर्गत शब्दार्थिक आधार
पूरे शब्द-परिवार में एक ही क्रिया
यह संदर्भ द्वारा अर्थ बदलना नहीं है। لقي एक स्थानिक-संबंधपरक क्रिया—सामना—बनाए रखता है, और रूपविज्ञान तय करता है कि किसी प्रयोग को कैसे नाम दिया जाए।
अपरिवर्तनीय तत्व सामना है: कोई सहभागी या स्थानांतरित विषय किसी प्रतिपक्ष, प्राप्तकर्ता, गंतव्य, सतह, अवस्था, घटना या दिशा के साथ सक्रिय संपर्क या उपस्थिति में प्रवेश करता है। आसपास की आयत सहभागियों और परिस्थितियों की पहचान करती है; वह इस संबंध को किसी नए शाब्दिक अर्थ से नहीं बदलती।
रूपविज्ञान उसी एक क्रिया के विभिन्न पक्षों को उभारता है। रूप I और रूप III सीधे सामना को नाम देते हैं। रूप II प्राप्तकर्ता के समक्ष वह प्रस्तुत करता है जो उसके साथ सामना-संबंध में आता है। रूप IV किसी विषय को गंतव्य के साथ सामना-संबंध में डालता है। रूप V ग्रहणशील पक्ष को ‘ग्रहण करना’ नाम देता है। रूप VIII पारस्परिक सामना को नाम देता है, जबकि कृदंत सामना करने वाले, डालने वाले या ग्रहण करने वाले सहभागियों को नाम देते हैं।
२७:६ और २:३७ का अंतर पद्धति को स्पष्ट करता है। २७:६ में कर्मवाच्य रूप II تُلَقَّى संबोधित व्यक्ति को ऐसे दिखाता है कि उसके समक्ष क़ुरआन प्रस्तुत किया जा रहा है। २:३७ में कर्तृवाच्य रूप V تَلَقَّى आदम को शब्द ग्रहण करते दिखाता है। सतह पर समान अक्षर एक ही अभेदित अंग्रेज़ी अर्थ की अनुमति नहीं देते; दर्ज रूप और वाच्य तय करते हैं कि सामना का कौन-सा पक्ष उभारा गया है।
संज्ञा تِلْقَاء दिशा को नाम देती है—वह दिशा जिसमें सामना स्थित है। इसलिए गति या कोई संबंधबोधक उस दिशा की ओर चलना या उससे उद्गम दिखा सकता है, बिना ‘की ओर’, ‘सामने’ और ‘अनुरूप’ को स्वयं संज्ञा के प्रतिस्पर्धी अर्थ बनाए।
मूल पाठ के स्रोत
- क़ुरआनी अरबी भाषिक कोश का शब्दकोश: لقي मूल-सूची لقي