क़ुरआन शब्दावली · स्वीकृत

مُلَاقٍ / مُلَاقِي / مُلَاقُوا

मुठभेड़

फॉर्म III सक्रिय कृदंत: मुठभेड़ की स्थिति में होना।

शब्दार्थिक दायरा

दायरा: सावधानी से संकलित खंड-समूह · प्रयोग: 8

शब्द-मूल: لقي

लेम्मा: ملاقوا · ملاقي · لاقي · ملاق

रूप: مُّلَٰقُوا۟ · مُلَٰقِي · مُّلَٰقُو · لَٰقِي · مُلَٰقٍ

प्रयोग के उदाहरणों की प्रदर्शित संख्या: 8; कुल संख्या: 8

क़ुरआन-क्रम में प्रदर्शित दायरा-बद्ध प्रयोगों की कुल संख्या: 8।

2:46

ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَأَنَّهُمْ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ

2:223

نِسَآؤُكُمْ حَرْثٌ لَّكُمْ فَأْتُوا۟ حَرْثَكُمْ أَنَّىٰ شِئْتُمْ وَقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُمْ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُم مُّلَٰقُوهُ وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ

2:249

فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِٱلْجُنُودِ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ مُبْتَلِيكُم بِنَهَرٍ فَمَن شَرِبَ مِنْهُ فَلَيْسَ مِنِّى وَمَن لَّمْ يَطْعَمْهُ فَإِنَّهُۥ مِنِّىٓ إِلَّا مَنِ ٱغْتَرَفَ غُرْفَةًۢ بِيَدِهِۦ فَشَرِبُوا۟ مِنْهُ إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ فَلَمَّا جَاوَزَهُۥ هُوَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ قَالُوا۟ لَا طَاقَةَ لَنَا ٱلْيَوْمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ قَالَ ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَٰقُوا۟ ٱللَّهِ كَم مِّن فِئَةٍ قَلِيلَةٍ غَلَبَتْ فِئَةً كَثِيرَةًۢ بِإِذْنِ ٱللَّهِ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ

11:29

وَيَٰقَوْمِ لَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًا إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّهُم مُّلَٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَلَٰكِنِّىٓ أَرَىٰكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ

28:61

أَفَمَن وَعَدْنَٰهُ وَعْدًا حَسَنًا فَهُوَ لَٰقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَٰهُ مَتَٰعَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ مِنَ ٱلْمُحْضَرِينَ

62:8

قُلْ إِنَّ ٱلْمَوْتَ ٱلَّذِى تَفِرُّونَ مِنْهُ فَإِنَّهُۥ مُلَٰقِيكُمْ ثُمَّ تُرَدُّونَ إِلَىٰ عَٰلِمِ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ

69:20

إِنِّى ظَنَنتُ أَنِّى مُلَٰقٍ حِسَابِيَهْ

84:6

يَٰٓأَيُّهَا ٱلْإِنسَٰنُ إِنَّكَ كَادِحٌ إِلَىٰ رَبِّكَ كَدْحًا فَمُلَٰقِيهِ

क़ुरआन-अंतर्गत शब्दार्थिक आधार

पूरे शब्द-परिवार में एक ही क्रिया

यह संदर्भ द्वारा अर्थ बदलना नहीं है। لقي एक स्थानिक-संबंधपरक क्रिया—सामना—बनाए रखता है, और रूपविज्ञान तय करता है कि किसी प्रयोग को कैसे नाम दिया जाए।

अपरिवर्तनीय तत्व सामना है: कोई सहभागी या स्थानांतरित विषय किसी प्रतिपक्ष, प्राप्तकर्ता, गंतव्य, सतह, अवस्था, घटना या दिशा के साथ सक्रिय संपर्क या उपस्थिति में प्रवेश करता है। आसपास की आयत सहभागियों और परिस्थितियों की पहचान करती है; वह इस संबंध को किसी नए शाब्दिक अर्थ से नहीं बदलती।

रूपविज्ञान उसी एक क्रिया के विभिन्न पक्षों को उभारता है। रूप I और रूप III सीधे सामना को नाम देते हैं। रूप II प्राप्तकर्ता के समक्ष वह प्रस्तुत करता है जो उसके साथ सामना-संबंध में आता है। रूप IV किसी विषय को गंतव्य के साथ सामना-संबंध में डालता है। रूप V ग्रहणशील पक्ष को ‘ग्रहण करना’ नाम देता है। रूप VIII पारस्परिक सामना को नाम देता है, जबकि कृदंत सामना करने वाले, डालने वाले या ग्रहण करने वाले सहभागियों को नाम देते हैं।

२७:६ और २:३७ का अंतर पद्धति को स्पष्ट करता है। २७:६ में कर्मवाच्य रूप II تُلَقَّى संबोधित व्यक्ति को ऐसे दिखाता है कि उसके समक्ष क़ुरआन प्रस्तुत किया जा रहा है। २:३७ में कर्तृवाच्य रूप V تَلَقَّى आदम को शब्द ग्रहण करते दिखाता है। सतह पर समान अक्षर एक ही अभेदित अंग्रेज़ी अर्थ की अनुमति नहीं देते; दर्ज रूप और वाच्य तय करते हैं कि सामना का कौन-सा पक्ष उभारा गया है।

संज्ञा تِلْقَاء दिशा को नाम देती है—वह दिशा जिसमें सामना स्थित है। इसलिए गति या कोई संबंधबोधक उस दिशा की ओर चलना या उससे उद्गम दिखा सकता है, बिना ‘की ओर’, ‘सामने’ और ‘अनुरूप’ को स्वयं संज्ञा के प्रतिस्पर्धी अर्थ बनाए।

मूल पाठ के स्रोत