क़ुरआन शब्दावली · स्वीकृत

ذَكَرَ

उपस्थित करना

किसी संदर्भित वस्तु को स्वयं، किसी अन्य सहभागी या श्रोतृसमूह के सामने सक्रिय रूप से उपस्थित करना या उपस्थित बनाए रखना। अभिव्यक्ति उसे उपस्थित करने का एक तरीका है، कोई दूसरा अर्थ नहीं।

शब्दार्थिक दायरा

दायरा: अर्थगत इकाई · प्रयोग: 274

शब्द-मूल: ذكر

लेम्मा: ذكر · تذكر · ذكرى · تذكرة · مدكر · ذاكر · تذكير · ادكر · ذاكرة · مذكور · مذكر

रूप: ٱذْكُرُ · ذِكْرِ · تَذَكَّرُ · ذِكْرَىٰ · يَتَذَكَّرُ · ٱذْكُرْ · يَذَّكَّرُ · ذِكْرًا · ذِّكْرِ · يَذْكُرُ · ذِكْرٌ · ذُكِّرُ · ذَكِّرْ · ذُكِرَ · ذِّكْرَ · مُّدَّكِرٍ · ذِّكْرَىٰ · ذِكْرُ · تَذْكِرَةٌ · تَذْكُرُ · ذَكَرَ · ٱذْكُر · تَتَذَكَّرُ · ذِكْرَ · ذِّكْرُ · تَذْكِرَةً · يُذْكَرَ · ذَكَرُ · ذَّٰكِرِينَ · يَذَّكَّرَ · ذُكِّرَ · ذِكْرٍ · ٱذْكُرِ · أَذْكُرْ · تُذَكِّرَ · يُذْكَرِ · تَذْكِيرِ · ٱدَّكَرَ · ذَكَرْ · أَذْكُرَ · نَذْكُرَ · يُذْكَرُ · ذَّٰكِرَٰتِ · تَذَكَّرَ · ذُكِّرْ · يَتَذَكَّرَ · ذِكْرَى · تَّذْكِرَةِ · مَّذْكُورًا · ذِّكْرَىٰٓ · مُذَكِّرٌ

प्रयोग के उदाहरणों की प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 274

क़ुरआन-क्रम में दायरा-बद्ध प्रयोगों का स्थान-आधारित संक्षिप्त पूर्वावलोकन—क्रम के आरंभ से प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 274। छोड़े गए प्रयोगों की संख्या 264 है; प्रदर्शित प्रयोगों को उनसे अधिक प्रबल साक्ष्य नहीं माना गया है।

2:40

يَٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَوْفُوا۟ بِعَهْدِىٓ أُوفِ بِعَهْدِكُمْ وَإِيَّٰىَ فَٱرْهَبُونِ

2:47

يَٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَٰلَمِينَ

2:63

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَٰقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَٰكُم بِقُوَّةٍ وَٱذْكُرُوا۟ مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ

2:114

وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن مَّنَعَ مَسَٰجِدَ ٱللَّهِ أَن يُذْكَرَ فِيهَا ٱسْمُهُۥ وَسَعَىٰ فِى خَرَابِهَآ أُو۟لَٰٓئِكَ مَا كَانَ لَهُمْ أَن يَدْخُلُوهَآ إِلَّا خَآئِفِينَ لَهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا خِزْىٌ وَلَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ

2:122

يَٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَٰلَمِينَ

2:152

فَٱذْكُرُونِىٓ أَذْكُرْكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِى وَلَا تَكْفُرُونِ

2:152

فَٱذْكُرُونِىٓ أَذْكُرْكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِى وَلَا تَكْفُرُونِ

2:198

لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَبْتَغُوا۟ فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ فَإِذَآ أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَٰتٍ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ عِندَ ٱلْمَشْعَرِ ٱلْحَرَامِ وَٱذْكُرُوهُ كَمَا هَدَىٰكُمْ وَإِن كُنتُم مِّن قَبْلِهِۦ لَمِنَ ٱلضَّآلِّينَ

2:198

لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَبْتَغُوا۟ فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ فَإِذَآ أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَٰتٍ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ عِندَ ٱلْمَشْعَرِ ٱلْحَرَامِ وَٱذْكُرُوهُ كَمَا هَدَىٰكُمْ وَإِن كُنتُم مِّن قَبْلِهِۦ لَمِنَ ٱلضَّآلِّينَ

2:200

فَإِذَا قَضَيْتُم مَّنَٰسِكَكُمْ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَذِكْرِكُمْ ءَابَآءَكُمْ أَوْ أَشَدَّ ذِكْرًا فَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِى ٱلدُّنْيَا وَمَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنْ خَلَٰقٍ

क़ुरआन-अंतर्गत शब्दार्थिक आधार

जागरूकता और अभिव्यक्ति में एक ही क्रिया

“उपस्थित करना” मानसिक जागरूकता، अभिव्यक्ति और सार्वजनिक प्रस्तुति में एक ही क्रिया बनी रहती है؛ शब्दरूप दिशा और सहभागी की भूमिकाओं को जोड़ता है।

“उपस्थित करना” 274 अलिंगी प्रयोगों में अपरिवर्तनीय अर्थ है। कोई संदर्भित वस्तु जागरूकता में، अभिव्यक्ति में या श्रोतृसमूह के सामने उपस्थित हो सकती है। ये वे क्षेत्र हैं जिनमें क्रिया साकार होती है، इसके स्थान पर आने वाले अलग अर्थ नहीं।

2:152 की पारस्परिक शब्द-रचना दोनों दिशाओं में उसी क्रिया को बनाए रखती है: मुझे उपस्थित करो؛ मैं तुम्हें उपस्थित करूँगा। 6:118 में ईश्वर का नाम भोजन पर अभिव्यक्ति के माध्यम से उपस्थित किया जाता है। 7:201 में पंचम रूप क्रिया को स्वयं कर्ता की ओर मोड़ता है।

शब्दरूप भेदों को संयोजित करता है। द्वितीय रूप किसी वस्तु को अन्य के सामने उपस्थित करता है، पंचम रूप उसे स्वयं के सामने उपस्थित करता है، और अष्टम रूप उसे फिर उपस्थिति में लाता है। संज्ञाएँ और सहभागी रूप उन्हीं संबंधों को रूप देते हैं।

लिंग-वर्ग की संज्ञा ذَكَر एक अलग यथार्थ शब्दांश है। इसके 18 प्रयोग मादा के साथ युग्मित या तुलना में रखे गए हैं، विशेषकर 3:36 और 92:3 में। यह शाब्दिक संयोग किसी भी एक अर्थ को दूसरे क्षेत्र में रखने की अनुमति नहीं देता।

जहाँ दूसरे अर्थ विफल होते हैं

स्मरण रखना

6:118

فَكُلُوا۟ مِمَّا ذُكِرَ ٱسْمُ ٱللَّهِ عَلَيْهِ إِن كُنتُم بِـَٔايَٰتِهِۦ مُؤْمِنِينَ

वैकल्पिक: उसमें से खाओ जिस पर ईश्वर का नाम स्मरण रखा गया था

शोधपरक अर्थ-प्रस्तुति: उसमें से खाओ जिस पर ईश्वर का नाम उपस्थित किया गया था

“स्मरण रखना” क्रिया को बनी हुई मानसिक जागरूकता तक सीमित कर देता है। इसके विपरीत، कर्मवाच्य उपवाक्य भोजन पर अभिव्यक्ति के माध्यम से ईश्वर के नाम को उपस्थित करता है।

याद दिलाना

76:1

هَلْ أَتَىٰ عَلَى ٱلْإِنسَٰنِ حِينٌ مِّنَ ٱلدَّهْرِ لَمْ يَكُن شَيْـًٔا مَّذْكُورًا

वैकल्पिक: एक वस्तु जिसे याद दिलाई गई

शोधपरक अर्थ-प्रस्तुति: एक वस्तु जिसे उपस्थित किया गया

कर्मवाच्य सहभागी रूप में प्रेरणार्थक याद दिलाने का कोई प्राप्तकर्ता नहीं है। यह उस वस्तु का नाम है जिसे जागरूकता या अभिव्यक्ति में उपस्थित किया गया है।