وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَٰتِنَآ أُو۟لَٰٓئِكَ أَصْحَٰبُ ٱلنَّارِ هُمْ فِيهَا خَٰلِدُونَ
क़ुरआन शब्दावली · स्वीकृत
آيَة / آيَات
निशानी
ऐसा प्रत्यक्ष या पहचाना जा सकने वाला चिह्न, जिसके माध्यम से कोई कम प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली वास्तविकता जानी जाती है।
शब्दार्थिक दायरा
दायरा: अर्थगत इकाई · प्रयोग: 382
शब्द-मूल: أيي
लेम्मा: آية
रूप: ءَايَٰتِ · ـَٔايَٰتِ · ءَايَةً · ءَايَٰتٍ · ءَايَٰتُ · ءَايَةٌ · ـَٔايَةٍ · ءَايَةٍ · ءَايَٰتٍۭ · ءَايَٰتٌ · ءَايَةَ · ءَايَتُ · ءَايَٰتٌۢ · ءَايَةٍۭ · ءَايَاتُ · ءَايَاتِ · ءَايَتَيْنِ · ءَايَةًۢ
प्रयोग के उदाहरणों की प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 382
क़ुरआन-क्रम में दायरा-बद्ध प्रयोगों का स्थान-आधारित संक्षिप्त पूर्वावलोकन—क्रम के आरंभ से प्रदर्शित संख्या: 10; कुल संख्या: 382। छोड़े गए प्रयोगों की संख्या 372 है; प्रदर्शित प्रयोगों को उनसे अधिक प्रबल साक्ष्य नहीं माना गया है।
وَءَامِنُوا۟ بِمَآ أَنزَلْتُ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَكُمْ وَلَا تَكُونُوٓا۟ أَوَّلَ كَافِرٍۭ بِهِۦ وَلَا تَشْتَرُوا۟ بِـَٔايَٰتِى ثَمَنًا قَلِيلًا وَإِيَّٰىَ فَٱتَّقُونِ
وَإِذْ قُلْتُمْ يَٰمُوسَىٰ لَن نَّصْبِرَ عَلَىٰ طَعَامٍ وَٰحِدٍ فَٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلْأَرْضُ مِنۢ بَقْلِهَا وَقِثَّآئِهَا وَفُومِهَا وَعَدَسِهَا وَبَصَلِهَا قَالَ أَتَسْتَبْدِلُونَ ٱلَّذِى هُوَ أَدْنَىٰ بِٱلَّذِى هُوَ خَيْرٌ ٱهْبِطُوا۟ مِصْرًا فَإِنَّ لَكُم مَّا سَأَلْتُمْ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ ٱلذِّلَّةُ وَٱلْمَسْكَنَةُ وَبَآءُو بِغَضَبٍ مِّنَ ٱللَّهِ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَيَقْتُلُونَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا۟ وَّكَانُوا۟ يَعْتَدُونَ
فَقُلْنَا ٱضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا كَذَٰلِكَ يُحْىِ ٱللَّهُ ٱلْمَوْتَىٰ وَيُرِيكُمْ ءَايَٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
وَلَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ءَايَٰتٍۭ بَيِّنَٰتٍ وَمَا يَكْفُرُ بِهَآ إِلَّا ٱلْفَٰسِقُونَ
مَا نَنسَخْ مِنْ ءَايَةٍ أَوْ نُنسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍ مِّنْهَآ أَوْ مِثْلِهَآ أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ
وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا ٱللَّهُ أَوْ تَأْتِينَآ ءَايَةٌ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّثْلَ قَوْلِهِمْ تَشَٰبَهَتْ قُلُوبُهُمْ قَدْ بَيَّنَّا ٱلْـَٔايَٰتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ
وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا ٱللَّهُ أَوْ تَأْتِينَآ ءَايَةٌ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّثْلَ قَوْلِهِمْ تَشَٰبَهَتْ قُلُوبُهُمْ قَدْ بَيَّنَّا ٱلْـَٔايَٰتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ
رَبَّنَا وَٱبْعَثْ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَٰتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ ٱلْكِتَٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُزَكِّيهِمْ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
وَلَئِنْ أَتَيْتَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَٰبَ بِكُلِّ ءَايَةٍ مَّا تَبِعُوا۟ قِبْلَتَكَ وَمَآ أَنتَ بِتَابِعٍ قِبْلَتَهُمْ وَمَا بَعْضُهُم بِتَابِعٍ قِبْلَةَ بَعْضٍ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ إِنَّكَ إِذًا لَّمِنَ ٱلظَّٰلِمِينَ
क़ुरआन-अंतर्गत शब्दार्थिक आधार
यह शब्द निशानी ही क्यों रहता है
آيَة किसी ऐसी पहचानने योग्य वस्तु का नाम है, जिसके माध्यम से कोई दूसरी वास्तविकता जानी जाती है। उसका अभिप्रेत विषय कोई घटना, व्यक्ति, स्थिति, सृजित परिघटना या पढ़कर सुनाई जाने वाली इकाई हो सकता है; केवल व्याकरणिक वचन ही निशानी, निशानियाँ या दो निशानियाँ का रूप देता है।
2:248 में पवित्र संदूक का आना बादशाहत की एक निशानी है, 2:259 में उस व्यक्ति को लोगों के लिए एक निशानी बनाया जाता है और 30:22 में सृष्टि, भाषाएँ और रंग निशानियाँ हैं। हर मामले में नामित वस्तु अपने से परे किसी वास्तविकता को पहचानने योग्य बनाती है। यही कार्य तब भी बना रहता है, जब अभिप्रेत विषय कोई संप्रेषित इकाई हो, जैसे 2:252 में पढ़कर सुनाई जाने वाली निशानियाँ और 3:7 में अवतरित ग्रंथ के भीतर की निशानियाँ।
इसलिए “आयत” इसका धर्मग्रंथ-संबंधी प्रयोग है, मूल शब्दार्थ नहीं। यह पवित्र संदूक के आने, किसी व्यक्ति या मनुष्यों के सृजित भेदों का नाम नहीं हो सकती। “चमत्कार” भी बहुत संकीर्ण है, क्योंकि बहुत-सी निशानियाँ असाधारण घटनाओं के बजाय संप्रेषित या देखे जा सकने वाले चिह्न हैं। “प्रमाण” इस संज्ञा की अपेक्षा से अधिक प्रबल है: निशानी संकेत करती है और किसी बात को पहचानने योग्य बनाती है, पर अपने-आप देखने वाले को निष्कर्ष मानने के लिए बाध्य नहीं करती।
2:41 में विनिमय की चेतावनी क़ुरआन की अपनी बार-बार आने वाली रचना से स्पष्ट होती है। 2:79 में लोग कुछ लिखते हैं और उसे अल्लाह की ओर ठहराते हैं, ताकि थोड़ी कीमत पाएँ। 3:187 में लोग अवतरित ग्रंथ को छिपाते हैं और उसके बदले थोड़ी कीमत पाते हैं। 9:9 में अल्लाह की निशानियों के बदले थोड़ी कीमत ली जाती है और फिर उसकी राह से रोका जाता है। इसलिए व्यावहारिक विफलता केवल लिखे हुए पाठ को बेचने तक सीमित नहीं है; इसमें सीमित लाभ के बदले उस चीज़ से समझौता करना भी शामिल है, जो अल्लाह के संदेश को ज्ञात कराती है।
2:41 की पूरी आयत का वर्तमान अनुवाद अभी अपरिवर्तित है, जबकि उसकी विनिमय-संबंधी व्याकरणिक रचना की अलग समीक्षा हो रही है। शब्द के स्तर पर بِآيَاتِي “मेरी निशानियाँ” का अर्थ देता है; वह निशानियों को आयतों, शिक्षाओं, प्रमाणों या कीमत में नहीं बदलता।
जहाँ दूसरे अर्थ विफल होते हैं
आयत
2:248
وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ ءَايَةَ مُلْكِهِۦٓ أَن يَأْتِيَكُمُ ٱلتَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَبَقِيَّةٌ مِّمَّا تَرَكَ ءَالُ مُوسَىٰ وَءَالُ هَٰرُونَ تَحْمِلُهُ ٱلْمَلَٰٓئِكَةُ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
वैकल्पिक: उसकी बादशाहत की आयत यह है कि पवित्र संदूक तुम्हारे पास आए।
शोधपरक अर्थ-प्रस्तुति: उसकी बादशाहत की निशानी यह है कि पवित्र संदूक तुम्हारे पास आए।
जिस घटना का वादा किया गया है, वह पवित्र संदूक का आना है। उस घटना को आयत कहना वहाँ एक पाठीय इकाई थोपता है, जहाँ प्रसंग एक पहचानी जा सकने वाली निशानी बताता है।
आयत
2:259
أَوْ كَٱلَّذِى مَرَّ عَلَىٰ قَرْيَةٍ وَهِىَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّىٰ يُحْىِۦ هَٰذِهِ ٱللَّهُ بَعْدَ مَوْتِهَا فَأَمَاتَهُ ٱللَّهُ مِا۟ئَةَ عَامٍ ثُمَّ بَعَثَهُۥ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِا۟ئَةَ عَامٍ فَٱنظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ وَٱنظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ وَلِنَجْعَلَكَ ءَايَةً لِّلنَّاسِ وَٱنظُرْ إِلَى ٱلْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًا فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥ قَالَ أَعْلَمُ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ
वैकल्पिक: हम तुम्हें लोगों के लिए एक आयत बनाएँगे।
शोधपरक अर्थ-प्रस्तुति: हम तुम्हें लोगों के लिए एक निशानी बनाएँगे।
वह व्यक्ति और उसके साथ जो घटता है, दूसरे लोगों के लिए पहचानने योग्य बन जाते हैं। किसी मनुष्य को केवल पाठ की एक आयत में नहीं समेटा जा सकता।
चमत्कार
3:7
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ عَلَيْكَ ٱلْكِتَٰبَ مِنْهُ ءَايَٰتٌ مُّحْكَمَٰتٌ هُنَّ أُمُّ ٱلْكِتَٰبِ وَأُخَرُ مُتَشَٰبِهَٰتٌ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَٰبَهَ مِنْهُ ٱبْتِغَآءَ ٱلْفِتْنَةِ وَٱبْتِغَآءَ تَأْوِيلِهِۦ وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُۥٓ إِلَّا ٱللَّهُ وَٱلرَّٰسِخُونَ فِى ٱلْعِلْمِ يَقُولُونَ ءَامَنَّا بِهِۦ كُلٌّ مِّنْ عِندِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّآ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَٰبِ
वैकल्पिक: अवतरित ग्रंथ में कुछ निर्णायक चमत्कार हैं; वे अवतरित ग्रंथ की नींव हैं और दूसरे परस्पर समान हैं।
शोधपरक अर्थ-प्रस्तुति: अवतरित ग्रंथ में कुछ निर्णायक निशानियाँ हैं; वे अवतरित ग्रंथ की नींव हैं और दूसरी परस्पर समान हैं।
यह संज्ञा अवतरित ग्रंथ के भीतर संप्रेषित इकाइयों को दर्शाती है। “चमत्कार” इस शब्द-परिवार को असाधारण घटनाओं तक सीमित कर देता है, जबकि “निशानी” इन इकाइयों और देखी जा सकने वाली घटनाओं, दोनों को समेटती है।
आयत
30:22
وَمِنْ ءَايَٰتِهِۦ خَلْقُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱخْتِلَٰفُ أَلْسِنَتِكُمْ وَأَلْوَٰنِكُمْ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَٰتٍ لِّلْعَٰلِمِينَ
वैकल्पिक: उसकी आयतों में आकाशों और धरती की रचना तथा तुम्हारी भाषाओं और रंगों की विविधता है।
शोधपरक अर्थ-प्रस्तुति: उसकी निशानियों में आकाशों और धरती की रचना तथा तुम्हारी भाषाओं और रंगों की विविधता है।
सृजित वास्तविकताएँ और मनुष्यों के देखे जा सकने वाले भेद इसके अभिप्रेत विषय हैं। यहाँ “निशानी” उपयुक्त है और तब भी, जब अभिप्रेत विषय पढ़कर सुनाई जाने वाली इकाई हो; “आयत” उपयुक्त नहीं है।